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    अमरनाथ से जुड़ा है मुसलमानों का ये हैरान करने वाला राज़
June 30, 2019 • अपूर्वा गोस्वामी

 

                 

2019 की अमरनाथ यात्रा 29 जून से शुरू हो चुकी हैं और ये यात्रा 7 अगस्त तक चलेगी गौरतलब है कि इस यात्रा के लिए लोग दुनिया के हर कोनों से आते हैं। यह बात तो आप सब जानते हैं कि  बाबा अमरनाथ बर्फानी की यात्रा बहुत ज्यादा मुश्किल होती हैं क्योकि यहाँ लोग खतरनाक रास्तो से और बहुत ऊंचे-ऊंचे पहाड़ो से अमरनाथ की गुफा तक पहुंच पाते हैं। सबसे आखिरी तक पहुँचने में बहुत ज्यादा परेशानी होती हैं क्योकि वहाँ पर अक्सर ऑक्सीजन की कमी रहती हैं। अमरनाथ धाम श्रीनगर से लगभग 135 किलोमीटर दूर हैं। समुन्द्र से 13600 मीटर की ऊंचाई पर यह गुफा स्थित हैं। इस गुफा के लम्बाई 160 फुट और चौड़ाई लगभग 100 फुट हैं। अपनी इस आज की रिपोर्ट में हम आपके लिए लेकर हाज़िर हैं अमरनाथ से जुडी कुछ ऐसी जानकारियां जिन्हें सुन कर आप भी हैरान रह जायंगे.

मिली जानकारी के अनुसार जिस इंसान ने अमरनाथ के महादेव की खोज की थी वो कोई हिन्दू नहीं बल्कि एक मुस्लमान हैं। उस शख्स का नाम बूटा मालिक था। एक दिन बूटा मालिक बेड चराते-चराते बहुत दूर निकल गया था। बर्फीले इलाके में उसकी एक साधु से मुलाकात हो गई। उस साधु ने बूटा मालिक को कोयले से भरी खान दी और जब बूटा मालिक वापस घर पहुंचा तो कोयला सोने में बदल गया था। उसी वक़्त मालिक ने साधु को धन्यवाद बोलने का सोचा इसलिए वह वापस साधु के पास जाने लगा। लकिन साधु के पास जाकर उसने कुछ ऐसा देखा जिससे वह हैरान रह गया। उसने देखा की जिस साधु ने उसको वह कांगड़ी दी थी वह वहाँ पर नहीं था। साधु की जगह बूटा मालिक को वहाँ पर एक गुफा मिली। वह जब उस गुफा के अंदर जा रहा था तो उसने एक ऐसी चीज देखी जो वाकई चौकाने वाली थी। बूटा को उस गुफा में एक बर्फ की शिवलिंग मिली और बूटा ने यह बात सब में फैला दी। यह बात उस समय के राजा के दरबार में जा पहुंची। इसके बाद धीरे-धीरे यहाँ  के महत्व के बारे में लोगो को पता चलने लगा। और फिर तब से यहाँ पर लोगो का आना-जाना शुरू हो गया और यह स्थान एक तीर्थ बन गया। हालाँकि कुछ लोगो का कहना हैं की बूटा मालिक मुस्लमान नहीं था। लकिन मिली जानकारी के मुताबित मालिक गुज्जर समाज का था। अमरनाथ गुफा की जो देखभाल करता हैं वो मुस्लमान परिवार हैं। और बूटा मालिक को वह अपना वंशज मानता हैं। हैरान कर देने वाली बात तो यह हैं की अमरनाथ पर हुए हमले में भक्तो को बचाने वाला भी एक मुस्लमान ही था। जिसका नाम सलीम था।

 

यह बात तो थी अमरनाथ की कहानी की और अब बात करते हैं की भगवन शिव और पार्वती अमरनाथ क्यों आये?

एक बार पार्वती जी ने शिव से पूछा की आप ये गले में मुंडमाला क्यों पहनते हो इस पर शिव ने बताया की "हे पार्वती तुम्हारा जितनी बार दुबारा जन्म होगा में उतनी ही मुंडमाला धारण करूँगा। इस पर पार्वती ने बोला की लेकिन मेरा तो बार-बार दुबारा जन्म होगा लेकिन आप तो अमर हो। हे स्वामी आप मुझे अमर कथा सुना दे इस बात को शिव जी ने कई सालो तक टाला लेकिन अंत में हार कर उन्हें माता पार्वती को अमर कथा सुननी ही पड़ी। परन्तु यह सुनाने के लिए उन्हें इसी जगह चाहिए थी जहाँ कोई न आये इसलिए उन्होंने सबसे पहले अपने वाहन नंदी को पहलगाम में छोड़ा फिर गणेश जी को गणेश टॉप पर और उसके बाद उन्होंने चन्द्रमा को अपनी जटाओ से अलग कर दिया और उसका नाम चंदनवाड़ी हो गया। इसके बाद गंगा जी को पंचतरणी और शेष नागो को शेषनाग पर छोड़ दिया। और फिर आगे चल कर उन्हें ये गुफा मिली और उन्होंने माता पार्वती को इस गुफा में बैठ कर कथा सुननी शुरू कर दी। कोई कथा न सुने इसलिए उन्होंने चारो तरफ आग प्रजलित कर दी।

अब बात करते हैं अमरनाथ के गुफा में दो कबूतरों के रहस्य की।

महाकाल ने माता पार्वती को अपनी अमर कहानी इस जगह पर ही सुनाई थी। यहाँ पर जो भी श्रद्धालु जाता हैं उसको एक कबूतरों का जुड़ा दिखाई देता हैं। ऐसा माना जाता हैं की ये कबूतरों का जोड़ा खुद शिव और पार्वती हैं। जिस किसी को भी यह जोड़ा दिख जाता हैं वह धन्य हो जाता हैं। जब अमनरनाथ की इस गुफा में शिव जी अमर कहानी माता पार्वती को सुना रहे थे तो माता कहानी सुनते सुनते सो गई। और उस समय वहाँ पर दो कबूतर थे जिन्होंने यह कथा सुन ली। भगवन शिव को इस बारे में न पता चल पाया क्योकि कबूतर गु-गु की  आवाज़ कर रहे थे तो शिव जी को लग रहा था की माता पार्वती सुन रही हैं।

जब कथा समाप्त हुई और शिव ने माता को देखा की वह तो सो गई हैं फिर महादेव की नज़र उन दोनों कबूतरों पर गई। और उनको देख कर महादेव को गुस्सा आ गया और वह दोनों उनकी शरण में आ गए। और बोले की "हे भगवन हमने आपसे अमर कथा सुनी हैं अगर आप हमे मार देंगे तो यह कथा झूठी हो जाएगी। हमे यहाँ पद प्रदान करे| महादेव ने उन्हें वरदान दिया की तुम दोनों यहाँ पर सदैव माता पार्वती और महादेव के रूप में रहोगे| और कबुतरो का यह जोड़ा अमर हो गया| साथ-ही-साथ यह गुफा भी अमर कथा की साक्षी हो गयी| इस तरह इस गुफा का नाम अमरनाथ पड़ा|

 

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