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ईद की शुरुआत कब कहाँ और कैसे हुई इसे क्यों मनाते है?
June 5, 2019 • रजत राज गुप्ता

ईद-उल-फितर या फिर जिससे मीठी ईद भी कहते है उससे आज पूरे विश्व में मनाया जा रहा है।  ईद-उल-फितर रमज़ान के पवित्र महीने में मनाया जाता है जिसमे मुसलमानों को दिन भर भूखे-प्यासे रहना होता है जिसे रोज़ा कहते है। रोज़ा सुबह 4 बजे से शुरू होता है और शाम को 6:55 पर खोला जाता है।।रोज़े के समय हमें कोई भी ऐसे बात या हरकत नहीं करनी होती है जिससे हमें रोज़ो में मिलने वाले शबाब को ना पा सके। हम आपको यह भी बता दे की ईद भी 2 तरह की होती है पहली मीठी ईद या ईद-उल-फितर और दूसरी बकरा ईद या ईद-उल-अधा होती है।चलिए जानते है की ईद की शुरुआत कब कहाँ और कैसे हुई और इससे क्यों मानते है।

ईद-उल-फितर रमजान का महीना इस्लामिक कैलेंडर में नवां और सबसे पवित्र महीना माना गया है।इस महीने अल्लाह की इबादत  भूखे-प्यासे रहे कर की जाती है। इस महीने इस्लाम के कैलेण्डर के हिसाब से 10 महीना होता है और इसी महीने की पहली शव्वाल वाली रात को ही ईद वाली रात होती है। चाँद के दिखने के बाद ही ईद उल फितर का एलान किया जाता है।ईद-उल-फितर में सब लोग सेवइयों से एक दूसरे का मुँह मीठा करते है और सबको एक छोटा सा इनाम दिया जाता है जिससे ईदी कहते है।सुबह सुबह ईद की नमाज पढ़े से पहले एक छोटी सी रकम निकली जाती है जिससे ज़कात भी कहते है।इस रकम क गरीबों और जरूरतमंदो के लिए निकल दी जाती है। नमाज़ के बाद परिवार के सभी सदस्यों को 2 किलो फितरा दी जाती है जिसमे कुछ ऐसे चीज देनी होती है जिससे हम रोज खा सके। पहली बार ईद-उल-फितर पैगम्बर मुहम्मद ने सं 624 ईस्वी में जंग-ऐ-बदर के बाद मनाई थी क्युकी पैगम्बर हज़रात मुहम्मद ने बद्र के युद्ध में जीत हासिल करि थी जिसकी ख़ुशी में यह त्यौहार मनाया जाता है।ईद की सुबह मस्जिदों में सुबह नमाज अदा करने से पहले हर मुसलमान का फ़र्ज़ है की वो दान करता हुआ मस्जिद जाए। रमजान के इस पवित्र महीने में रोज़े रखने का फ़र्ज़ दिए गया है जिससे इंसान को भूख और प्यास का एहसास हो सके और वह लालच से दूर रह कर सही रस्ते पे चले।

रमजान के दिन कई तरह के पकवान बनते है जिनमे मिठ्ठी सेवई सबसे ज्यादा बनाई जाती है।मुसलमान ईद में खुदा का शुक्रिया भी अता करता है क्यों की अल्लाह ने हमें महीने भर भूखा प्यासा रखने की हिम्मत नवाज़ी।

मीठी ईद के ढाई महीने बाद ही बकरईद मनाई जाती है। मन जाता है की ईद-उल-आधा वाले दिन बकरो की कुर्बानी दी जाती है जिसकी शुरुआत हज़रात इब्राहिम ने करी थी।