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किन्नर के अंतिम संस्कार में क्यों मारा जाता है चपल-जूतों से
July 1, 2019 •  अपूर्वा गोस्वामी

 

         

किन्नर समाज को लेकर वैसे तो कई बाते है जो हर कोई जानना चाहता हैं। यह बात आप सब जानते हैं की जितना अलग किन्नरों का समाज हैं उतने ही अलग उनके रीती-रिवाज हैं। समाज में इसको थर्ड जेंडर या ट्रांस जेंडर के नाम से भी जाना जाता हैं। और अगर हम बात करे इनके रीती-रिवाज के तो वह सबसे अलग ही होते हैं। ऐसी बहुत सी बाते हैं इनके बारे में जिनको लोग जानना चाहते हैं वही लोग सबसे ज्यादा इच्छुक होते हैं यह जानने में की किन्नरों का अंतिम संस्कार कैसे होता हैं और आज हम आपको अपनी इस रिपोर्ट में यही बताने वाले हैं तो आइये शुरू करते हैं।

किन्नर की मौत के बाद उसका अंतिम संस्कार बहुत ज्यादा गुप्त तरीके से किया जाता हैं। जब भी किसी किन्नर की मृत्यु हो जाती हैं तो उसकी मृत्यु को किसी बहार के समुदाय को नहीं देखने दिया जाता हैं। ऐसी मान्यता हैं की अगर कोई किन्नर की शव यात्रा देख लेता हैं तो वह इंसान भी अगले जन्म में किन्नर पैदा होता हैं।

 

किन्नरों के समुदाय में शव को अग्नि नहीं दी जाती बल्कि दफनाया जाता हैं। और हैरान कर देने वाली बात तो यह हैं की शव को उठाने से पहले जूते-चपलो से पीटा जाता हैं। जी हा अपने सही सुना जूते-चपलो से ही पीटा जाता हैं शव को। हमारे समाज में दिन के वक़्त ही अंतिम संस्कार किया जाता हैं लेकिन किन्नर समाज में उल्टा हैं उनके यहाँ रात के समय शव यात्रा निकली जाती हैं। और एक और हैरान कर देने वाली बात यह हैं की जिसके यहाँ किन्नर की मृत्यु हुई हैं वह परिवार एक हफ्ते तक भूखा रहता हैं। हलाकि किन्नर समुदाय की बात करे तो न तो वह इसको मानते हैं न ही इंकार करते हैं।

 

किन्नर समाज की सबसे बड़ी विशेषता हैं की यह मृत्यु के बाद शोक नहीं मानते हैं। यह मान्यता हैं की यह शोक इसलिए नहीं मानते हैं क्योकि इनका मानना हैं की उस किन्नर को जिसके मृत्यु हुई हैं उसको इस नरक जैसे जीवन से छुटकारा मिल गया। इसलिए मरने के बाद यह ख़ुशी मनाते हैं। यह अपने पैसो से दान भी करते हैं जिससे उसे दुबारा किन्नरों के रूप में जन्म न मिले।

गौरतलब हैं की हर साल किन्नरों के संख्या 25 से 30 हजार बढ़ती रहती हैं। देशभर में 90 प्रतिशत किन्नर जन्म-जत नहीं होते हैं बल्कि उन्हें किन्नर बनाया जाता हैं। देश में 30 लाख से भी ज्यादा किन्नरों को तीसरे दर्जे में शामिल कर लिया गया हैं। लेकिन आज भी इनका समुदाय समाज से दूर अपनी अलग ज़िन्दगी बीता रहा हैं। और साथ-ही-साथ अपने अलग रीती-रिवाजो का पालन भी कर रहा हैं।

 

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