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दिल्ली में है मिनी कुतुबमीनार !
July 6, 2019 • Rajat Raj Gupta

 

नई दिल्ली। आप लोगों ने दिल्ली के कुतुब मीनार के बारे में तो सुना ही होगा की वो कितना बड़ा है और उसे मुग़लों के समय में बनवाया गया था लेकिन क़ुतुब मीनार इक्लोती ऐसी मीनार नहीं है जिसको मुग़लों के समय बनाया गया हो। कुतुब मीनार के अलावा एक और ऐसी ईमारत है जो दिल्ली में है और मुग़लों के समय ही बनाई गयी है।

 

हस्तसाल मीनार दिल्ली के हस्तसाल गांव में है। हस्तसाल मीनार का निमार्ण 17वीं शताब्दी में मुगल बादशाह शाहजहां के समय में बनवाया था। शाहजहां ने यह ईमारत अपने शिकारगाह के तौर पर बनवायी थी। इस पांच मंजिला इमारत में आज सिर्फ तीन मंजिल ही बची है। इस मीनार को बनाने के लिए लाल बलुआ पत्थर और ईंट का इस्तेमाल किया गया था। इस मीनार में एक पतली सी सीढ़ी थी, जो ऊपर तक जाती थी लेकिन देखभाल के आभाव में यह साड़ी सीढ़ियां टूट गयी है। इस मीनार में एक सुरंग भी है, जो बरादरी से जुड़ती है। शाहजहां ने बरादरी का निर्माण मनोरंजन के लिए बनाया था।  हस्तस्थल ईमारत का नाम वहां पर रह रहे हाथिओं की वजह से पड़ा है। 17वीं शताब्दी में जब यह ईमारत बनाई गयी थी तब दिल्ली के हस्तसाल गांव व उसके आसपास के इलाकों में तालाब बहुत बड़े हुआ करते थे जिसकी वजह से हाथी वहीँ आराम करते थे। हस्तसाल के एक बुजुर्ग का कहना है कि हाथी वहीं रहेंगे जहां पानी और जंगल होगा।

 

हस्तसाल के आसपास स्थित बुढेला, केशोपुर, रजापुर खुर्द, नवादा, ककरौला, मटियाला गांव में भी कई तालाब थे। इसी खासियत के कारण यहां शाही हाथियों को लाया जाता था। हस्तसाल गांव में बकायदा यह मीनार बनाई गई थी, जिसकी ऊपरी मंजिल पर खड़े होकर सैनिक हाथियों पर नजर रख सकते थे और आसपास घने जंगल होने के कारण यहां जानवर भी खूब होते थे। कई लोग तो इस मीनार को शाहजहां के शिकार से भी जोड़ते हैं। उनका मानना है की इस मीनार से शाहजहां अपने शिकार पर नजर रखता था और मौका मिलते ही उन्हें मार देता था।

 

लेकिन अब इस जगह पर कुछ ही तालाब बचे हुए है जिनकी देख भल करने वाला कोई नहीं है और हस्तसाल ईमारत जो की एक हिस्टोरिकल  जगह है उसको भी किसी ने नहीं संभाला है जिसकी वजह से इसकी इतनी दुर-दशा हो गयी है। भारत में हस्तसाल जैसे काफी इमारतें है  जो ऐसे ही खराब हो रही है।