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बड़े-बड़े वादे और मेनका गाँधी की असली सच्चाई
June 6, 2019 • Gulshan Verma

 

उत्तर प्रदेश । भाजपा सांसद मेनका गाँधी ने सुल्तानपुर से चुनाव लड़ते हुए अपनी जीत को लगातार कायम रखा और एक बार फिर से सुल्तानपुर जिले से 14 हज़ार वोटों से विजयी हुईं । हर बार की तरह उन्हें जनता ने प्यार-दुलार तो दिया लेकिन इस प्यार में कोई खास कशिश नज़र नहीं आई ना मेनका गाँधी को और ना ही बीजेपी को। मेनका से जब मीडिया ने ये सवाल किया कि उन्हें कैबिनेट मंत्री क्यों नहीं बनाया गया तो उनका कहना था कि इस सवाल का जवाब सुल्तानपुर की जनता बेहतर दे सकती है, मतलब साफ़ था कि जनता ने उन्हें जिस अंतर से जिताया है वो नाकाफी था उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाने के लिए।

जहाँ एक तरफ मेनका गाँधी ने तमाम बड़े -बड़े वादे किये हुए हैं सुल्तानपुर की जनता के साथ और  विकास के सपने भी खूब दिखाए हैं सुल्तानपुर की जनता को वहीं एक ऐसी सच्चाई भी है जिसे जनता नहीं जानती है और ये सच्चाई है संजय गाँधी और मेनका गाँधी को लेकर आपको बताते चलें कि सन् 1980  में मेनका गाँधी संजय गाँधी की दुल्हन बनकर सुल्तानपुर में आईं थीं और 2019 के लोकसभा चुनाव में मेनका गाँधी ने ये कहते हुए वोट मांगे थे कि मैं सुल्तानपुर की बहु हूँ और मुझे अपना वोट दीजिये ताकि मैं अपने पति संजय गाँधी से किया हुआ वादा पूरा कर सकूँ। जानकारी देते चलें कि जब संजय गाँधी और मेनका गाँधी की शादी हुई थी तब संजय गाँधी ने गोमती ब्रिज, एक बड़ा हॉस्पिटल, और एक शक्कर मिल अपनी शादी की ख़ुशी में सुल्तानपुर की जनता के नाम कर दी थी। गौरतलब है कि संजय गाँधी ने दस एकड़ ज़मीन इस शक्कर मिल के नाम लगाई थी और 1983 में इस मिल की शुरुआत कर दी गई थी।

वहीँ एक मीडिया रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि सुल्तानपुर की इस मिल में काम करने वाले कर्मचारियों के घर खाने के लाले पड़े हुए हैं, सुल्तानपुर कि शक़्कर मिल में तक़रीबन 800 से 900 कर्मचारी काम करते हैं जिन्हे पिछले दो वर्षों से वेतन यानि सैलरी नहीं मिली है और मजदूरों को वेतन ना मिलने का मुख्य कारण है इस मिल में लगातार होने वाला घाटा जिसकी तरफ सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है साल 2018 में इस मिल में तक़रीबन तीन सौ अस्सी करोड़ का घाटा हुआ है जिसका नतीजा ये हुआ कि यहाँ के कर्मचारी पाई पाई को तरस गए हैं।

जहाँ एक तरफ मेनका गाँधी बड़े-बड़े वादे कर रहीं हैं और मीडिया के सामने ये साबित करने की कोशिश कर रहीं हैं कि वो जनता का बहुत ख़्याल रखती हैं वहीँ इस शक़्कर मिल की दुर्दशा के बारे में ना मेनका गाँधी विचार करती हैं और ना है मीडिया उनकी इस नाकाम कोशिश पर ध्यान देता है ऐसे में ज़ाहिर है जिस जिले में आठ नौ सौ कर्मचारी रोज़ भूखे सोते होंगे जहाँ पिछले दो साल से काम करने के बावजूद लोगों को एक पैसा नहीं मिला होगा वहां से जीतने पर किस तरह की दुआ लग सकती है ?सांसद मेनका गाँधी के लिए ये वाकई सोचनीय प्रश्न है । 

मेनका गाँधी इस बात के लिए बेहद ही प्रसिद्ध हैं कि उन्होंने जानवरों की स्थिति सुधारने की दशा में कई सराहनीय काम किये हैं जो बेशक काबिल-ए-तारीफ हैं लेकिन सुल्तानपुर की इस शक़्कर मिल में जिन इंसानों की ज़िंदगियाँ आज जानवरों से भी बद्तर हो चुकी हैं उनकी इस बुरी हालत का उनकी भूख का ज़िम्मेदार आखिर कौन हैं ? क्या ये ही है मेनका गाँधी कि असली सच्चाई, क्या ये ही है बीजेपी का विकास ? आपकी इस पुरे मुद्दे पर क्या राय है हमें कमेंट कर के ज़रूर बताएं।