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 प्रदूषण से निपटने के लिए लीक से हटकर समाधान तलाशने का अनुरोध
October 31, 2019 • Gulshan Verma

उपराष्ट्रपति ने अधिकांश शहरों में हवा की खराब गुणवत्ता पर चिंता प्रकट की उपराष्ट्रपति का स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने का आह्वान उपराष्ट्रपति ने सीएसआईआर-एनईईआरआई, नागपुर में आयनों पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया

     उपराष्‍ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडू ने आज देश के अनेक भागों में प्रदूषण के बढ़ते स्तरों पर चिंता प्रकट की तथा वैज्ञानिकों  और शोधकर्ताओं से प्रदूषण से निपटने के लिए नवोन्मेषी और लीक से हटकर समाधान तलाशने का अनुरोध किया।

      नागपुर में सीएसआईआर-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (एनईईआरआई) में 'आयनों पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन' का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत के अधिकांश शहरों में हवा की गुणवत्ता के 'खराब' या 'गंभीर' स्तरों पर चिंता प्रकट की। विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की भारत में पर्यावरण की स्थिति (एसओई) रिपोर्ट, 2019 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण भारत में होने वाली 12.5 प्रतिशत मौतों के लिए जिम्मेदार है।

      श्री नायडू ने कहा कि पर्यावरणीय प्रदूषण और वायु की गुणवत्ता में खराबी देश के समक्ष वर्तमान में मौजूद प्रमुख चुनौतियों में से एक है। श्री नायडू ने इस बात पर जोर दिया कि जब हमारे शहर, प्रगति के वाहक हानिकारक धुएं की घुटन की गिरफ्त में है और पानी तथा मिट्टी प्रदूषित हो चुके हैं, तो ऐसे में सुरक्षित, संरक्षित, स्वस्थ और खुशहाल भविष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

       हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के तत्काल उपाए करने का आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति ने ऊर्जा के स्वच्छ और नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देने की जरूरत पर बल दिया। उपराष्ट्रपति ने बढ़ते शहरीकरण और उससे जुड़े अन्य कारणों से जहरीले होते जा रहे जल स्रोतों की नियमित सफाई, संरक्षण और रख-रखाव करने का सुझाव दिया।

      श्री नायडू ने कहा कि स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण सभी का निरंतर विकास सुनिश्चित करने की दिशा में अनिवार्य आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के दूषित होने का सीधा प्रभाव राष्ट्र के विकास पर पड़ेगा। विश्व आर्थिक मंच के निष्कर्षों का हवाला देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत में पर्यावरणीय दुर्दशा की अनुमानित लागत 3.75 ट्रिलियन (80 बिलियन डॉलर) है।

      कई अध्ययनों में कैंसर का संबंध प्रदूषण और विकिरण सहित अनेक पर्यावरणीय कारकों से जोड़े जाने का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि यह भारत में हृदय रोग के बाद मौतों का दूसरा प्रमुख कारण है और इस पर चिकित्सकों और नीति-निर्माताओं दोनों को ध्यान देने की जरूरत है।

      उन्होंने कैंसर के लिए निरंतर नवाचार करने तथा ऐसे नवीन और ज्यादा तेजी से न  फैलने वाले उपचार सृजित करने का आह्वान किया, जो किफायती हों और आम लोगों को आसानी से सुलभ हो सकते हों। उन्होंने कहा, 'मानव स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती किसी भी राष्ट्र की प्रगति की बुनियाद है। हमें हर हाल में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक नागरिक को अच्छी गुणवत्ता वाला जीवन तथा प्रगति और खुशहाली के अवसरों तक पहुंच मिले।'

      उपराष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़े पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी  जोखिमों को समझना अनिवार्य है। उन्होंने वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों से अनुरोध किया कि वे इसके कारणों और उनमें कमी लाने के उपायों की पहचान करने की दिशा में अपने अनुसंधानों को पुनः व्यवस्थित करें।

      उपराष्ट्रपति ने वैज्ञानिक समुदाय, शोधकर्ताओं और विद्वानों से अनुरोध किया कि वे जनता को वायु, जल प्रदूषण के बढ़ते स्तरों तथा प्रमुख पर्यावरणीय संसाधनों की दुर्दशा जैसे मामलों से निपटने में भागीदार बनने के लिए प्रोत्साहित करें। श्री नायडू ने कहा कि राष्ट्र विकास की प्रक्रिया में जनता को भागीदार बनाया जाना अनिवार्य है।

      उपराष्ट्रपति ने 15वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान पत्रिका का विमोचन करते हुए 'जागृति कार्यक्रमः एक समाज एक लक्ष्य' का शुभारंभ किया और कहा कि वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को जनता विशेषकर युवाओं को जीवन के टिकाऊ माध्यमों को अपनाने और अनुसंधान संबंधी जानकारी उन्हें स्थानीय भाषाओं में प्रदान करने की दिशा में प्रयास करने चाहिए, ताकि आम लोग उन्हें बेहतर ढंग से समझ सकें।

      इस संगोष्ठी में सांसद (राज्य सभा) डॉ. विकास महात्मे, सीएसआईआर-एनईईआरआई के निदेशक डॉ. राकेश कुमार, संगोष्ठी अध्यक्ष डॉ. सोनाली खन्ना, स्वास्थ्य मंत्रालय में एफएसएसएआई में प्रमुख विशेषज्ञ डॉ. टी.के. जोशी, प्रोफेसर और एसोसिएट डीन, जैक्सन स्टेट यूनिवर्सिटी, मिसिसिपी, अमरीका के प्रो. पॉल टेकोन्वू, और सीएसआईआर-एनईईआरआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एच. जे. पुरोहित उपस्थित थे। इस संगोष्ठी में धातु आयन, जीवविज्ञान और पर्यावरण विज्ञान क्षेत्रों के प्रमुख प्रतिनिधियों ने भाग लिया।