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अयोध्या केस का सच जिसके बारे में किसी को पता नही है
October 21, 2019 • Rajat Raj Gupta



अयोध्या केस पूरी दुनिया का सबसे मशहूर केस। इस केस के बारे में आज तक सिर्फ एक ही जानकारी को बताया है जिसको हर किसी ने पहले ही सुना हुआ है या फिर उसे इस बारे में पहले ही किसी ने बता दिया है लेकिन इस केस के बारे में आज भी एक ऐसा काला सच है जिसके बारे में आज तक किसी को भी नही पता है।

 

वैसे तो इस केस के बारे में ले कर काफी ज्यादा धारणाएं है लेकिन असली बात क्या है हम आपको बताते है। वर्ष 1989 में ये विवाद सबसे पहले उठा था जब विश्व हिन्दू परिषद् ने अयोध्या में विवादित स्थल के पास राम मंदिर का शिलान्यास किया इस के बाद से भाजपा और हिंदू संगठनों का उत्साह चरम पर था। इस उत्साह को और बडाने के लिए सितंबर 1990 में भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने श्रीराम रथ यात्रा का आयोजन किया। ये आइडिया भाजपा के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन का था और इसका मकसद देशभर में लोगों को अयोध्या मूवमेंट के बारे में जागरूक करना और इसके साथ जोड़ना था। इस रथ यात्रा को लोगों ने जबरदस्त साथ दिया। इसके बाद राम मंदिर निर्माण के लिए पूरे देश में उठी लहर में दो वर्ष बाद 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा (बाबरी मस्जिद) को गिरा दिया गया।  विवादित ढांचा गिरते ही पूरे भारत में इतिहास का सबसे बड़ा सांप्रदायिक दंगा भड़क गया जिसकी वजह से देशभर में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों ने 2000 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। विदेशों तक में इस हिंसा की निंदा हुई। इस घटना से केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार बहुत ज्यादा दबाव में आ गयी। नतीजा ये हुआ कि 26 जनवरी 1993 को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने घोषणा कर दी कि उसी स्थान पर फिर से मस्जिद का निर्माण कराया जाएगा। वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए अयोध्या समिति गठित की। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुस्लिम पक्षों से बात कर समझौते की रूपरेखा तैयार करने को कहा। इसके बाद विश्व हिन्दू परिषद् ने 15 मार्च 2002 से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरू करने की घोषणा कर दी थी। जिसकी वजह से सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में एकत्र भी हुए। ट्रेन से वापस लौटते वक्त गुजरात के गोधरा में 58 हिंदुओं की संदिग्ध परिस्थिति में ट्रेन में आग लगने से मौत हो गई थी, जिसने बाद में गोधरा दंगों का रूप ले लिया था। ट्रेन में आग एक बड़ी साजिश का हिस्सा मानी जाती है। जिसका खुलासा आज तक नही हुआ है| विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद यूपी पुलिस ने मामले में लाखों कार सेवकों समेत कुछ नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। मामले की जांच पहले सीआईडी और फिर क्राइम ब्रांच ने की। सीआईडी ने फरवरी 1993 में आठ आरोपियों के लिखाफ ललितपुर की विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी। इस केस में कई दिग्गज नेताओं के नाम शामिल हैं। बाद में इस केस को लखनऊ ट्रांसफर कर दिया गया था। मई 2003 में सीबीआई ने मामले में लालकृष्ण आडवाणी समेत 13 लोगों के खिलाफ पूरक आरोप पत्र दायर किया था। हालांकि, लालकृष्ण आडवाणी को कोर्ट ने बरी कर दिया था लेकिन 06 जुलाई 2005 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में लालकृष्ण आडवाणी का नाम आरोपियों में दोबारा शामिल करने का आदेश दिया। बताया जाता है कि इस केस में कुल 49 लोगों को आरोपी बनाया गया था। इसमें से 12 लोगों की केस की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। केस से जुड़े 55 गवाहों की भी मौत हो चुकी है। इस केस में अब तक किसी को सजा नहीं हुई है।

 

इस पूरे केस में गौर करने वाली तीन चीजे है, इस केस में गोधरा से लौटने वाली ट्रेन में आग कैसे लगी और किसने लगाई इसका भी खुलासा आज तक नहीं हुआ है, अगर विकिपीडिया पर भी आप सर्च करते है तो उसमे भी सूचना सही से नही दी गयी है और अंत में लिखा है की भारत सर्कार की गठित जांच कमिशन भी इस घटना पर साफ़-साफ़ रौशनी नहीं डाल पाई है, विकिपीडिआ पर लिखा है की, “भारत सरकार द्वारा नियुक्त की गई अन्य जाँच कमीशनों ने घटना की असल पर निश्चित रूप से कोई रोशनी नहीं डाल सकी|"  इसके बाद बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के केस पर भी किसी को सज़ा क्यों नहीं मिली.  ये सारे सवाल एक ही बात कहते है की ये एक राजनीति थी जो की बीजेपी सरकार ने उस समय की थी ताकि उनकी सरकार बन सके. बहरहाल इस मुद्दे को लगभग 29 साल हो गये है और अब इस केस को ले कर जल्द ही फैसला आ जायेगा क्यों की इस केस की सुनवाई अब खत्म हो चुकी है और बताया जा रहा है की इस केस का फैसला नवम्बर के महीने में आ जायेगा.